Supreme Court allows passive euthanasia in Harish Rana case after medical boards confirm no chance of recovery. Know the full story, legal background and 2018 guideline impact.
भारत में इच्छा मृत्यु (Passive Euthanasia) को लेकर एक ऐतिहासिक मोड़ सामने आया है। Supreme Court of India ने हरीश राणा केस में एक महत्वपूर्ण आदेश जारी करते हुए पैसिव यूथेनेशिया की अनुमति दे दी है। यह फैसला भारत में इस तरह के मामलों के लिए एक नई कानूनी दिशा तय कर सकता है।
करीब 13 साल से कोमा जैसी स्थिति में जी रहे हरीश राणा के मामले में कोर्ट ने मेडिकल रिपोर्ट और परिवार की स्थिति को देखते हुए यह संवेदनशील फैसला सुनाया।
हरीश राणा का हादसा साल 2013 में हुआ था। वह Panjab University के हॉस्टल से गिर गए थे, जिससे उन्हें गंभीर हेड इंजरी हुई।
इस दुर्घटना के बाद से वह लगातार पैथेटिव (Vegetative) स्टेट में रहे और डॉक्टरों ने शुरू से ही उनकी रिकवरी की संभावना बेहद कम बताई थी।
करीब 13 वर्षों तक उनके माता-पिता ने हर संभव इलाज करवाया। देश के कई अस्पतालों और विशेषज्ञ डॉक्टरों से सलाह ली गई, लेकिन कोई सुधार नहीं हुआ।
हरीश राणा के परिवार ने पहले 2024 में हाई कोर्ट में याचिका दाखिल की थी। हालांकि, वहां उनकी याचिका खारिज कर दी गई।
इसके बाद मामला Supreme Court of India में पहुंचा। लंबी सुनवाई और मेडिकल रिपोर्ट्स की समीक्षा के बाद कोर्ट ने 2026 में अपना फैसला सुनाया।
फैसले से पहले कोर्ट ने दो अलग-अलग मेडिकल बोर्ड बनाए।
पहला मेडिकल बोर्ड गाजियाबाद जिला अस्पताल के डॉक्टरों से बनाया गया था। उनकी रिपोर्ट में बताया गया कि हरीश राणा के ठीक होने की संभावना नहीं है।
इसके बाद दूसरा मेडिकल बोर्ड All India Institute of Medical Sciences (AIIMS) के विशेषज्ञ डॉक्टरों का बनाया गया।
AIIMS की टीम ने भी विस्तृत जांच के बाद यही निष्कर्ष दिया कि रोगी के ठीक होने की कोई संभावना नहीं है।
दोनों मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट और परिवार से बातचीत के बाद Supreme Court of India ने पैसिव यूथेनेशिया की अनुमति दे दी।
कोर्ट के आदेश के अनुसार:
कोर्ट ने हरीश राणा के माता-पिता की विशेष सराहना की।
करीब 13 साल तक उन्होंने अपने बेटे की देखभाल बिना किसी शिकायत के की। उन्होंने भावनात्मक, मानसिक और आर्थिक रूप से हर संभव प्रयास किया।
जजों ने कहा कि इतनी कठिन परिस्थिति में भी परिवार ने धैर्य और जिम्मेदारी का उदाहरण पेश किया।
यह फैसला पूरी तरह से 2018 के ऐतिहासिक निर्णय पर आधारित है।
उस समय Aruna Shanbaug केस में सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया को लेकर विस्तृत दिशानिर्देश जारी किए थे।
उसी फैसले में यह स्पष्ट किया गया था कि किन परिस्थितियों में किसी मरीज का लाइफ सपोर्ट सिस्टम हटाया जा सकता है।
हरीश राणा मामले में कोर्ट ने उन्हीं दिशानिर्देशों को लागू करते हुए यह फैसला सुनाया।
यह फैसला भारत की न्यायिक प्रणाली में कई मायनों में महत्वपूर्ण है:
हरीश राणा केस भारत में राइट टू डाई विद डिग्निटी की बहस को एक नया आयाम देता है। Supreme Court of India का यह फैसला दिखाता है कि न्यायपालिका संवेदनशील मामलों में मानवीय दृष्टिकोण को भी महत्व देती है।
आने वाले समय में यह निर्णय कई ऐसे मामलों के लिए मिसाल बन सकता है, जहां मरीज की रिकवरी की कोई संभावना नहीं होती।
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